हम शर्मिन्दा हैं ....

हम शर्मिंदा हैं कि हम एक ऐसे व्यवसाय से जुड़े हैं, जिसका काम लोगों में वैज्ञानिक चेतना और शिक्षा के प्रचार -प्रसार की जगह भय और अंधविश्वास का बढ़ावा देना हो गया है। मीडिया की इसी नासमझी ने मध्यप्रदेश के सारंगपुर जिले के आशारेता गांव की निवासी 16 वर्र्षीया छाया की जान ले ली। पृथ्वी की उत्पत्ति समझने के लिए किए जा रहे एक वैज्ञानिक प्रयोग को मीडिया ने इस तरह प्रचारित किया कि इस बच्ची ने मानसिक संतुलन खो दिया और दुनिया खत्म होने के डर से जहर खाकर आत्महत्या कर ली। हो सकता है कि पुलिस इस मामले में निजी टीवी चैनलों पर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा दर्ज करे और हो सकता है कि न भी करे। गोल मानी जानेवाली ये दुनिया भले ही खत्म हो न हो, पर मीडिया ने छाया की दुनिया खत्म कर दी। मीडिया को लेकर लंबे समय से हम बहसों में उलझे हैं कि यह मिशन है या प्रोफेशन। लेकिन लगता है कि यह निर्लज्ज पूंजीवाद का ऐसा अंग बन गया है, जो लोगों को अनपढ़ बनाए रखने और उनकी एकता को तोड़ने के हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। पहले तोहमत समाचार पत्रों पर ही लगाई जाती थी, पर निजी टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले समाचारों (अगर उन्हें समाचार कहा जा सकता है, तो) ने तो स्वरूप को और भी बिगाड़ दिया है। आम आदमी की जिंदगी की जो बात पहले कभी-कभार हो जाती थी, वह अब बिल्कुल ही बंद हो गई है। जिंदा लोगों की बात करने में इन्हें परहेज है, पर भूत-प्रेतों पर घंटों एक ही कार्यक्रम चलता रहता है। हो सकता है कि भूख से मरा कोई व्यक्ति भूत बनने के बाद ही अपनी व्यथा इन समाचार चैनलों पर सुना सके, जिंदा रहते उसकी बात सुनने को तो कोई तैयार नहीं है।
धरती के रहस्य को जानने के लिए किए जा रहे प्रयोग को महाप्रलय का नाम देकर लोगों को डराना इनके लिए अपनी टीआरपी बढ़ाने भर का एक साधन है। भाग्यवादी और धर्मभीरु इस देश की जनता पर इसका क्या असर पड़ने वाला है, इसकी चिंता उन्हें नहीं है। वे बता रहे हैं कि अगर महाप्रलय से बचना है, तो काशी-मथुरा चलो। जो हिंदू नहीं हैं या जिनमें काशी-मथुरा जाने की कूवत नहीं है, उन्हें बचने का अधिकार नहीं है क्या?
1951 में अमरीका ने भारत के बारे में एक विस्तृत सर्वेक्षण कराया था, आज भी अमरीका उसी सर्वेक्षण के आधार पर अपनी नीतियां बनाता है। इस सर्वेक्षण का केन्द्र बिन्दु एक सांस्कृतिक संगठन था। सर्वेक्षण के अनुसार अगर हिन्दुस्तानी जनता की एकता को तोड़ना है, तो इस संगठन को बढ़ावा देना होगा। उसी के बाद से अमरीका ने इस संगठन को वित्तीय सहायता देना शुरू किया और फिर उसका विस्तार होता चला गया। अमरीका आज भी उसी दिशा में काम कर रहा है और पूंजीवाद के इशारे पर काम करनेवाले निजी चैनल इसी संगठन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। राम के पदचिन्हों से लेकर कृष्ण के सिंहासन को ढूंढ़ने के नाम पर खोजी पत्रकारिता की जा रही है। रावण कहां पैदा हुआ था, कैसा था, यह अनुसंधान का विषय हो गया है। अगर किसी सिक्केपर राम का चिन्ह मिल जाए, तो एक घंटे का कार्यक्रम तैयार हो जाता है। सीता की साड़ी और शंकर के त्रिशूल को खोजने के काम में लगे रिपोर्टरों पर लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। देश की बेरोजगारी, भुखमरी, पलायन, बच्चों की तस्करी, दहेज के लिए मारी जा रहीं महिलाएं, दवाओं के अभाव में दम तोड़ता बचपन, वैश्यावृत्ति की तरफ धकेली जाती बच्चियां इनकी टीआरपी नहीं बढ़ातीं।
निजी चैनलों का हाल यह है कि देश-विदेश के मुख्य समाचार देखना-सुनना भी मुश्किल हो गया है। 24 घंटे चलनेवाले इन चैनलों में पूरी रात कार्यक्रमों को दोहराया ही जाता है। दिन के समय में दो घंटे खली निकाल देता है, दो घंटे अश्लील चुटकुले सुनाने वाले खराब करते हैं, दो घंटे बाबा बैरागी लोगों को ग्रह- दशाओं के नाम पर डराते रहते हैं, कुछ समय टीवी पर चल रहे रियलिटी शो के अंश दिखाने में निकल जाता है। गंडे-ताबीज से लेकर एकमुखी रुद्राक्ष का प्रचार-प्रसार इन चैनलों पर किया जाता है। ग्रहण अगर किसी त्योहार के दिन हुआ, तो ये आदमी को इतना डरा देंगे कि उसका घर से निकलना ही बंद हो जाए। अब महाप्रलय नहीं हो सकी, तो उसकी तिथि आगे बढ़ा दी गई है। कहा जा रहा है, कि प्रलय अब २२सितम्बर होगा। इन घोर अवैज्ञानिक चैनलों के लिए केन्द्र सरकार के पास कोई उपाय नहीं है। यह सारा भयादोहन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया जा रहा है। अगर छाया ने आत्महत्या की है, तो उसके लिए जितनी जि?मेदारी इन निजी चैनलों की है, उतनी ही जिम्मेदार केन्द्र सरकार भी है, जो इन पर अंकुश लगाने में स्वयं को अपाहिज महसूस करती है। हमें पता है कि इस आत्महत्या के बाद भी केन्द्र सरकार और निजी चैनलों को कोई शर्मिंदगी नहीं होगी। लेकिन हम जैसे मुट्‌ठी भर लोग, जिनके लिए पत्रकारिता व्यापार नहीं है, शर्मिंदगी महसूस कर सकते हैं और कर रहे हैं।

कोसी ही नहीं, हम भी कसूरवार

यद्यपि यह अवसर कसूरवारों की शिनाख्त का नही है, लेकिन फ़िर भी जल प्रलय में डूबते-उतराते बिहार की चीखों से यह अग्नि प्रश्न जरूर सुनाई दे रहा है कि क्या इस महात्रासदी के लिए केवल और केवल कोसी ही जिम्मेवार है ? या फ़िर वह तंत्र और व्यवस्था भी जिस पर बिहार को इस " श्राप" से जितना हो सके अधिकतम सुरक्षित रखने की जिम्मेवारी थी ? कोसी का कोप नया नही है. बिहार के भाग्य के साथ यह त्रासदी सदियों से नत्थी है. लेकिन दुर्भाग्यग्रस्त इस राज्य से जो सूचनाएँ आ रही हैं वे न केवल समूचे राष्ट्र को शर्मसार करने वाली हैं बल्कि हमारी संवेदनहीनता और निष्ठुरता को भी रेखांकित कर रही है. वहां कोसी के कोप और उसके उतार-चढाव पर नजर रखने के लिए बने " कंट्रोल रूम " में लगे यंत्र अरसे से ख़राब पड़े थे. क्या यह अकेला सच राज्य के शासनतंत्र के मुंह में कालिख पोतने भर को पर्याप्त नहीं है ? यह तथ्य कि राज्य में उन कानों ने, जिन पर उन्हें सुनने की जिम्मेवारी थी, लगातार ऐसी चेतावनियों को अनसुना कर दिया, जो कोसी के कोप की आहटें बता रहीं थीं. राज्य में जारी इस मृत्यु-संघर्ष के लिए वे कान कोसी से कहीं ज्यादा कसूरवार लगते हैं.बिहार के ललाट पर कोसी ने जितना दुर्भाग्य लिखा है, उससे कहीं ज्यादा तो ख़ुद हमने लिख दिया. उस सत्ता और शासन ने लिख दिया जिस पर इस पिछडे-गरीब सूबे की हिफाजत और तरक्की की जिम्मेदारी है. सरकारों और नौकरशाहों के लिए जब तक बाढ़ और सूखा वार्षिक अतिरिक्त उगाही का साधन बनते रहेंगे तब तक उनकी रूचि इन आपदाओं से निपटने के लिए किसी किस्म के स्थाई उपायों तक नहीं जायेगी. काशी के दशाश्वमेध घाट पर बैठे डोम के लिए अर्थियां शोक नहीं, उल्लास का विषय हुआ करतीं हैं. कोसी पहली बार कृपित नही हुई... उसके तांडव से बिहार परिचित है. फ़िर आख़िर अभी तक कोई ऐसा तंत्र क्यों नही विकसित हो सका जो आपदा आने पर बिना समय गँवाए सक्रिय हो सके और जो इतना सक्षम हो कि नुकसान को न्यूनतम बिन्दु तक सीमित रख पाए? इस प्रश्न का उत्तर "साहिबों" की ईमानदारी पर अंगुली उठाता है. " टाईम्स" पत्रिका में सुर्खियाँ बटोरने वाले नौकरशाहों का भी बाढ़ राहत के नम पर लूट के कारोबार में संलिप्त पाया जाना शायद बिहार के लिए कोसी से भी बड़ा श्राप है. बिहार सिर्फ़ लालुओं,पासवानों या नीतीशों की सियासी बाजीगरी का मैदान भर नही है. लग्जरी कार में बैठकर बाढ़ पीडितों को पाँच-पाँच सौ के नोट बांटकर अपनी जय-जयकार कराने वाले नेताओं ने राज्य का शायद कई कोसियों से ज्यादा नुकसान किया है. त्रासदी के इन गहन क्षणों में भी राज्य के राजनेतिक योद्धा उस गंभीरता, समझ और संवेदनशीलता का परिचय नहीं दे पा रहे हैं जो मानवीयता की न्यूनतम कसौटी हैं. छिछले आरोप और दंभ से भरी उक्तियाँ राहत व् बचाव के पुण्य कार्य पर भारी दिख रही हैं. सम्भव है कि देर-सवेर कोसी के कोप को नियंत्रित कर लिया जाए या कोई ऐसा तंत्र विकसित हो जाए जिससे इसका कहर अगली बार कम हो जाए लेकिन राजनेताओं को संवेदनशील बनाने के लिए कोई मंत्र-तंत्र या टोना-टोटका फिलहाल तो तलाशने से भी दिखाई नहीं दे रहा है. जातीय उन्माद से प्राणऊर्जा पाने और अपराधियों की बैसाखियों के सहारे सत्तारोहण करने वाले राजनेता बिहार ही नहीं, देश के लिए गहरे दुर्भाग्य के प्रतीक हैं..... बिहार या यों कहें कि उस देश के लाखों लोग बीते पन्द्रह -सत्रह दिनों से जीवन और मृत्यु के बीच खींचतान से हलकान हैं, जहाँ केन्द्र सरकार विकास दर के आंकडे लेकर आत्ममुग्धता के चरम पर आसीन है. उसके पास खुश होने को विकासदर है और चिंता करने को परमाणु करार. रायसीना की पहाडियों पर स्थित सत्ता केन्द्र की नजर में कोसी से उपजे संकट कहाँ समाते हैं? करार पर वह आईऐईऐ में सौ से ज्यादा मुल्कों को अपने मसौदे पर राजी कर लेती है और एनएसजी में ४५ देशों की स्वीकृति जुटा लेने का भरोसा रखती है, लेकिन बिहार में बाढ़ के प्रश्नों पर स्थाई तौर पर विराम लगाने के लिए वह नेपाल जैसे छोटे पड़ोसी और मित्र राष्ट्र को राजी नहीं कर पाती है. आपदा प्रबंधन के नाम पर बने राष्ट्रीय प्राधिकरण की बाढ़ के मसले पर बैठक हुए अरसा हो गया, लेकिन हुकूमत-ए-हिन्दुस्तान के लिए ऐसे मसले प्राथमिकता सूची से बहुत दूर हैं. बाढ़ देश भर में तीन हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की वार्षिक क्षति करती है, इंसानी जानों का नुकसान अलग, लेकिन सत्ता और तंत्र चलाने वालों की चिंता-परिधि में यह सवाल अभी तक अपनी जगह नहीं बना पाया है.बाढ़ के नाम पर हर साल हजारों करोड़ का गोरखधंधा सत्ता प्रतिष्ठानों को रास आता है, लेकिन नदी जोड़ने जैसे विकल्पों पर उसकी नजर नहीं जाती. यहाँ एक बात और सारा दोष सरकार पर डालकर हम अपने दायित्यों से बरी नहीं हो सकते. बिहार की पीड़ा सरकारी शब्दकोष के शब्द "राष्ट्रीय आपदा" के एलान भर से समूचे राष्ट्र की नहीं हो सकती. खेद के साथ कहना पड़ेगा की बिहार की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने-मनने और उसके निराकरण के लिए सक्रिय होने के लिए शेष भारत को जो कुछ करना चाहिए था, वह सब नहीं किया जा रहा. बिहार पूरे देश का है, इस नाते यह पीड़ा भी पूरे देश की होनी चाहिए. लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता तब तक हम आख़िर कैसे कहें कि हम इससे राष्ट्रीय आपदा की गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ जुड़े हैं ?

एजुकेशन लोन: परदेस में पढ़ाई का रास्ता

स्नातक या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की पढ़ाई के लिए सात समंदर का रुख करना अब दूर की कौड़ी नहीं रह गया है। इसका श्रेय जाता है एजुकेशन लोन को। कॉलेज में दाखिला सुनिश्चित होने के बाद अपने एडमिशन कार्ड , मार्कशीट और बैंक स्टेटमेंट एवं आवश्यक सिक्युरिटी (यदि कोई चीज गिरवी रखी गई है तो) की फोटोकॉपी के साथ लोन के आवेदन से जुड़ा कार्ड जमा कराइए और अपने पड़ोस के बैंक से लोन ले लीजिए।
गिरवी रखने की जरूरत
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मुख्य महाप्रबंधक (पर्सनल बैंकिंग) पी। नंदकुमारन ने कहा , ' आम तौर पर विदेश में पढ़ाई का लोन 7।5 लाख रुपए से ज्यादा का होता है इसलिए छात्र को कुछ न कुछ गिरवी रखना होता है। अलग-अलग मामलों में इसमें थर्ड पार्टी की गारंटी भी मदद देती है। ' बैंक 4 लाख रुपए तक लोन के लिए कोई संपत्ति बंधक रखने के लिए नहीं कहते। 7।5 लाख रुपए तक के लोन के लिए आप थर्ड पार्टी की गारंटी से काम चला सकते हैं। गिरवी रखने के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट , राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र या यहां तक कि लोन की रकम के बराबर की संपत्ति का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। बैंक सिक्युरिटी के तौर पर रकम के बराबर की बीमा पॉलिसी की मांग भी कर सकते हैं। छात्र की मृत्यु होने की सूरत में इससे लोन की रकम जुटाई जा सकती है।
लोन का ब्योरा
बैंक जो शिक्षा लोन देते हैं , वे इंडियन बैंक्स असोसिएशन की मॉडल एजुकेशन लोन स्कीम पर आधारित होते हैं जिसकी शुरुआत 2001 में हुई थी। इस स्कीम के तहत लोन की रकम , कोई चीज गिरवी रखने , ब्याज दर , माजिर्न का पैसा और लोन के भुगतान से जुड़े कई नियम-कायदों का जिक्र किया गया है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया , आंध्र बैंक , बैंक ऑफ इंडिया जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इस सेगमेंट के सक्रिय खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। हालांकि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि शिक्षा लोन के लिए आप किस बैंक का दामन थामते हैं क्योंकि ब्याज दरों में मामूली अंतर है। लेकिन यदि आप इनमें से किसी बैंक से पहले से जुड़े हैं तो आपको कुछ फायदा रहता है। विदेश में शिक्षा के लोन के लिए आपको 15 फीसदी मार्जिन राशि अपनी जेब से चुकानी होगी। उदाहरण के लिए , यदि पाठ्यक्रम का कुल खर्च 15 लाख रुपए है तो बैंक आपको 12।75 लाख रुपए का लोन देगा। 2.25 लाख रुपए की शेष राशि आपको अपने संसाधनों से जुटानी होगी। लोन चुकाने की मियाद 5 से 7 साल के बीच होती है और यह भुगतान पाठ्यक्रम खत्म होने के एक साल बाद या फिर नौकरी लगने के 6 महीने बाद (जो पहले हो) शुरू होता है।
बीमा कवर का रखें ख्याल
कुछ ऐसे विदेशी विश्वविद्यालय हैं जो छात्रों के पास बीमा पॉलिसी को अनिवार्य बनाते हैं। कुछ कैम्पस में कवर का विकल्प चुनने पर जोर देते हैं तो दूसरे संस्थान अपनी पसंद के बीमा कवर के चुनाव की छूट देते हैं। आईसीआईसीआई लोम्बार्ड , न्यू इंडिया एश्योरेंस , बजाज एलांयज , टाटा एआईजी और रिलायंस जनरल इंश्योरेंस जैसे बीमा कंपनियां इस तरह का कवर उपलब्ध कराती हैं। इन पॉलिसी में 5,00,000 डॉलर तक के चिकित्सा खर्च कवर होते हैं। इसके अलावा दुर्घटना , सामान खोने , व्यक्तिगत देनदारी और मेडिकल इमरजेंसी के मामले में 2 तरफ का टिकट भी कवर होता है। कुछ पॉलिसियों में चिकित्सा हालात के मद्देनजर पढ़ाई में दखल पैदा होने को भी शामिल किया जाता है। छात्र स्पॉन्सर सुरक्षा भी ले सकते हैं जो उनकी मृत्यु की स्थिति में ट्यूशन फीस का भुगतान करती है। यदि छात्र 7 दिन से ज्यादा वक्त तक अस्पताल में भर्ती रहता है तो बीमा कंपनी छात्र/पारिवारिक सदस्यों के राउंड ट्रिप इकॉनमी क्लास टिकट और विदेश में रहने का खर्च भी देती है। छात्र कवरेज पीरियड की सुविधा ले सकते हैं जो 30 दिन से लेकर अधिकतम 2 साल तक हो सकता है। इससे 30 दिन से 2 साल अधिकतम की अतिरिक्त मियाद तक भी बढ़ाया जा सकता है। छात्र को एकमुश्त प्रीमियम का भुगतान करना होता है। यदि छात्र पढ़ाई के लिए अमेरिका या कनाडा के किसी विश्वविद्यालय में जाता है तो अधिक चिकित्सा खर्च की वजह से प्रीमियम काफी ज्यादा हो सकता है। मसलन यदि आप 2 साल की किसी पॉलिसी के तहत 5,00,000 डॉलर की राशि का बीमा कराते हैं तो अमेरिका या कनाडा में इसका प्रीमियम 32,000 रुपए तक तथा दूसरे मुल्कों में 18,000 रुपए तक हो सकता
महत्वपूर्ण नुस्खा
लोन के 2 चरण होते हैं। पहला मंजूरी का चरण और दूसरा लोन मिलने का चरण। हालांकि मंजूरी मिलते वक्त लोन की मूल राशि पर गौर किया जाता है लेकिन बैंक यह कर्ज आपकी जरूरत के मुताबिक सालाना या सेमेस्टर आधार पर देता है। नंदकुमारन ने कहा , ' छात्र के आग्रह किए बिना हम लोन की राशि नहीं देते। ' यदि आपको सस्ते आधार पर आर्थिक मदद मिलती है तो लोन को एक ही सेमेस्टर पर समेट देना चाहिए। इससे लोन भुगतान का भार कुछ कम होता है। लोन के भुगतान की मियाद 5 से 7 साल तक हो सकती है। विदेश में शिक्षा से जुड़े बीमा कवर के लिए हमेशा ऐसी बीमा कंपनी की सेवा लेनी चाहिए जो वैश्विक स्तर की थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर से जुड़ी हो। इससे इलाज के खर्च की रकम लेने के लिए छात्र को भागदौड़ नहीं करनी होगी।
साभार : गिरधर.कॉम

होम लोन लेने से पहले जुटाएं जानकारी

दिल्ली या किसी मेट्रो शहर में मध्यवर्गीय परिवार की पहली हसरत घर खरीदने की होती है। इस चाहत को पूरा करने के लिए बड़ी रकम की जरूरत होती है। घर खरीदने के लिए बचत तो करनी ही पड़ती है, बैंक से कर्ज भी लेना पड़ता है। होम लोन की अर्जी देने से लेकर अपने घर के ख्वाब को पूरा करने तक कई मंजिलें तय करनी पड़ती हैं। यह घर चुनने के साथ शुरू होती है। इसके बाद घर का ख्वाब पूरा करने के लिए कर्ज लेने की बारी आती है। इसमें कौन सा बैंक सबसे कम ब्याज दर पर कर्ज देगा, इसकी तलाश शुरू होती है।लोन की राशि बड़ी होने की वजह से भुगतान की अवधि भी लंबी होती है। लोन की अवधि के दौरान ब्याज दर भी बदलती रहती है। ब्याज दर बढ़ने पर भुगतान की राशि में भी इजाफा होता है। अगर यह दर गिरती है तो मासिक किस्त (ईएमआई) की संख्या में भी कमी हो सकती है। इसे देखते हुए होम लोन लेने से पहले पूरी योजना बना लेनी चाहिए।योजना बनाएं मकान खरीदने का फैसला करने से पहले यह तय कर लें कि आप उस पर कितना पैसा खर्च कर सकते हैं। मकान खरीदना निवेश से अधिक जीवनशैली से जुड़ा फैसला होना चाहिए, खासकर तब जब आप और आपका परिवार उसमें रहने की योजना बना रहा है। आप कितना बड़ा मकान खरीदने की वित्तीय क्षमता रखते हैं, यह जानने के लिए अपने परिवार के बजट की समीक्षा करें। बजट से आपको अपनी वर्तमान वित्तीय स्थिति और मासिक किस्त के भुगतान की क्षमता जानने में मदद मिलेगी।किसी भी बजट में सबसे पहले आमदनी की बात आती है। इसमें पति या पत्नी का वेतन, कानूनी सेटलमेंट से मिलने वाली राशि, रॉयल्टी, फीस और डिविडेंड मिलने वाली राशि शामिल हो सकती है जिसका दोबारा निवेश नहीं किया जाता। मासिक आय जानने के बाद यह तय किया जा सकता है बजट में खर्चे घटाने के बाद आपके पास कितनी अतिरिक्त राशि बच रही है। इस राशि का इस्तेमाल लोन की किस्त के भुगतान के लिए किया जा सकता है।लंबी अवधि के लिए बजट अधिकतर परिवार अपना बजट केवल वर्तमान आय के आधार पर ही तैयार करते हैं। लेकिन इसमें और भी चीजों को शामिल करना चाहिए। यह एक बार की प्रक्रिया नहीं है। यह समय बीतने के साथ बदलती रहती है। होम लोन की अवधि 25 वर्ष तक की हो सकती है, इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि सभी परिवर्तनों को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया जाए।इस संबंध में वेतन का उदाहरण लिया जा सकता है। परिवार के सदस्यों का वेतन लंबी अवधि में समान नहीं रहेगा। आप किस क्षेत्र में काम कर रहे हैं इसके आधार पर प्रमोशन और नौकरी बदलने से वेतन बढ़ सकता है। दूसरी और करियर में रुकावट आने से लोन के भुगतान का कार्यक्रम डगमगा सकता है। इसके मद्देनजर अपने करियर के विकास के आधार पर वेतन में कुछ वृद्धि के साथ बजट बनाना ठीक रहता है। इसके अलावा कुछ अप्रिय स्थितियों के लिए भी पहले से बजट में प्रावधान रखना चाहिए।सही धनराशि तय करना अगला कदम यह तय करना होगा कि आप कितनी राशि का लोन लेना चाहते हैं। संपत्ति खरीदने के लिए फैसला करने का पहला कदम बजट होता है लेकिन यह जानना भी अच्छा रहता है कि बैंक आपको अधिकतम कितनी राशि का लोन दे सकते हैं। बैंक कर्जदार की आय, पूर्व में भुगतान का इतिहास और संपत्ति की कीमत के आधार पर लोन देता है। आमतौर पर बैंक कर्जदार की कुल वाषिर्क आय का 3।5 से 4 गुना लोन के रूप में देते हैं। लंबी अवधि के लिए यह राशि अधिक हो सकती है।बैंक यह तय करने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कुछ बैंकों से बातचीत के बाद आपको अंदाजा हो जाएगा कि अधिकतम कितना लोन मिल सकता है। बैंक संपत्ति की कीमत का लगभग 85-90 फीसदी लोन के रूप में देते हैं। अधिकतर बैंक इसमें स्टांप और रजिस्ट्रेशन शुल्क को भी शामिल करते हैं।ज्यादातर बैंक कर्जदार और उसके पति या पत्नी की आय के आधार पर लोन देते हैं। हालांकि बातचीत करने पर कुछ बैंक लोन की योग्यता बढ़ाने के लिए आपके निकट संबंधियों (अभिभावक, भाई-बहन, और बच्चे) की आय को भी जोड़ने पर राजी हो सकते हैं।भुगतान की क्षमता होम लोन के भुगतान की क्षमता आपकी आय और खर्च के तरीके पर निर्भर करती है। अगर आपकी मासिक आय 15,000 रुपए और मासिक खर्च 9,000 रुपए है तो 4,000 रुपए वह राशि मानी जा सकती है जो आप होम लोन की मासिक किस्त के रूप में चुका सकते हैं।लोन की योग्यता का आकलन इस प्रकार होता है: 11 फीसदी की ब्याज दर पर 20 वर्ष की अवधि के लिए 1 लाख रुपए के लोन की मासिक किस्त लगभग 1,100 रुपए होगी।बैंक एक साधारण फॉर्म्युला के जरिए लोन की योग्यता का आकलन करते हैं। एक लाख रुपए के होम लोन की योग्यता तय करने के लिए लोन के भुगतान के लिए उपलब्ध राशि को चयनित अवधि के लिए प्रति लाख रुपए की किस्त से भाग दिया जाता है (ऊपर दिए गए उदाहरण के अनुसार लोन की योग्यता= 4,000 रुपए को 1,100 से भाग देने के बाद एक लाख रुपए से गुणा करने के बाद 3.63 लाख रुपए होगी)।लोन के भुगतान की क्षमता जितनी अधिक होगी लोन की योग्यता भी उतनी ही बढ़ जाएगी। लोन लेते समय व्यक्ति को एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि लोन की अवधि के दौरान ब्याज की दरों में बदलाव होता है। इस बदलाव से मासिक किस्त पर असर पड़ता है। अगर कर्जदार युवा हैं, तो बैंक लोन की अवधि बढ़ाने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन अगर कर्जदार की आयु 40 वर्ष से ऊपर है तो ब्याज दरें बढ़ने पर उसके पास मासिक किस्त की राशि में इजाफा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता।

अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें

साभार : http://www.girdher.com/

छोटे हाथों में बड़े फैसले

भारतीय संसदीय लोकतंत्र की विडंबना देखिए विश्वासमत पर मनमोहन सरकार अगर बचेगी तो उन बेहद छोटे दलों और कुछ निर्दलियों के समर्थन से, जिन्हें न तो इस परमाणु करार की तकनिकी जटिलताओं का पता है और न ही यह के यह समझौता भारत और अमरीका के रिश्तों की मौजूदा संरचना को कैसे और कहाँ तक बदल सकता है? जुलाई 22 को लोकसभा में सरकर जाएगी या रहेगी, यह तय करने की हैसियत अब न तो सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के हाथ में है और न ही लालकृष्ण अडवानी, प्रकाश करात और मायावती के । करार और सरकार दोनों के भविष्य पर अंतिम निर्णय करने की हैसियत अब शिबू सोरेन, चौधरी अजित सिंह, एचडी देवगौड़ा और कुछ हद तक उमर अब्दुल्ला जैसों के हाथों में आकर सिमट गई है। यह अंकगणित का चमत्कार है, जहां मुद्दे और सिद्घांत सब बेमानी हो जाते हैं। सदन की बौद्घिक बहसें बांझ हो जाती हैं और राष्ट्रीयहित बेहद स्थानीय और निजी लाभों में बंद हो जाते हैं। दावे चाहें जो हों और शोरगुल चाहे जितना भी, आज की स्थिति यह है के लोकसभा में करार और सरकर के विरोध में लगभग 265 मत दिख रहे हैं और समर्थन में लगभग 261 मत। वो भी तब जब समाजवादी पार्टी के सभी 39 सांसद अपने नेता मुलायम सिंह के निर्देश पर विश्वासमत के पक्ष में मतदान कर दें। हालांकी इसकी संभावना बेहद कम है। सपा के लगभग पांच से छह सांसदों का झुकाव बसपा की ओर है और उन्हें लोकसभा का अगला चुनाव भी हाथी पर सवार होकर लडऩा है। ऐसे मे फैसला अब उन जद (एस) के 2, राष्ट्रीय लोकदल ke 3, एआईएमआईएम ke 1, जेएमएम के 5, नेशनल कांफ्रेंस के 2 और 2 निर्दलियों के हाथों में है, जिनका रुख अभी तक सार्वजनिक तौर पर ज्ञात नहीं हुआ है। क्यों की अभी तक सत्ता शिविर और इनके बीच शायद समझौते की शर्तें तय नहीं हो पाईं हैं। मनमोहन सिंह के पास अब देने को बहुत कुछ है भी नहीं। केंद्रीय मंत्रिमंडल का आकार अब प्रधानमंत्री की मर्जी पर तय नहीं होता। संसद ने कानून बना कर मंत्रिमंडल के सदस्यों की संख्या को निर्धारित कर दिया है। फिलहाल तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में इतनी रिक्तियां नहीं हैं, जिनमें इन सभी भावी समर्थको की महत्वाकंछायें मनमोहन सिंह समायोजित कर सकें यही कुल जमा पंद्रह सांसद यह तय कर के सरकार और करार का क्या होगा?

मध्यप्रदेश की माया

अहम ब्रह्म अम्बेडकर, मध्यप्रदेश के ब्राह्मणों मैं इन दिनों अजीब अकुलाहट है। ख़ुद को सबसे बड़ा अम्बेडकरवादी साबित करने की होड़। अकेला ब्रह्मण ही क्यों पूरा सवर्ण वर्ग ही इस दौड़ मैं शामिल है, ब्राह्मण कुछ ज्यादा। उप्र में जब से मायावती का सोशल फार्मूला हिट हुआ है,तमाम प्रदेशों का भाईचारा राजनीतिक अप्रत्याशिता के इस अवसर को लपक लेने की फिराक में है। मप्र इससे अछुता नहीं है। मप्र के कस्बों की दीवारें इन दिनों माया और उनके भाईचारा गान में रंगी हुई हैं ।मायावती को सामाजिक सद्भाव का देवदूत बताते यह संदेश सवर्ण वर्ग को सत्ता के गलियारे तक पहुँचने के लिए सुनहरे रस्ते की तरह नजर आ रहा है। जातिवादी सम्मेलन में भीड़ का उन्माद तो देखते ही बनता है । पंडितों के बीच रातों रात नए नेता प्रगट हो गए । यह वो लोग हैं जो कभी अपने कसबे और शहर में गली की राजनीति किया करते हैं । इनके पास पैसे की ताकत है और मायावती उन्हें एक अवसर दिखाई दे रही हैं । इन लोगों के बीच आज एक बात नारे की तरह प्रचलित हो रही है । अहम् ब्रह्म अम्बेडकर । सबसे बडा अम्बेडकरवादी होने का दिखावा । सबसे बडा दलित होने की खाव्हिश । इनमें से बहुत कम को ही अम्बेडकर और उनके सिद्धांतों से कोई लेना देना हो। बहुतेरे तो इस सबसे वास्ता ही नही रखते। उनके लिए अम्बेडकर होने का मतलब है दलितों के साथ उठाना बैठना और उनके हितैषी होने का ढोंग करना। उनके लिए दलित एक वोट बैंक है जो जातीयता के इस उन्मादी युग में उनकी जात के सत्ता तक पहुँचने की उनकी क्वाहिश को पूरा कर सकता है। मध्यप्रदेश के जातिगत आंकडो की बात करें तो यहाँ ब्राह्मण की सिथति यूपी से अलग है। प्रदेश की ३०० से अधिक विधानसभा में ३० फीसदी भी ऐसी नही हैं जहाँ ब्रह्मण अकेले अपने दम पर कोई सीट जिता सके। प्रदेश के उत्तर-पछिम इलाके मैं अनुसूचित और पिछड़ा वर्ग की संख्या अधिक है । बसपा इस इलाके में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती आ रही है। उसकी असली पहचान तो जनजातीय क्षेत्र में होनी है । यहाँ अभी तक जनजातीय वर्ग का कांग्रेस से मोह नहीं टूटा है । इस इलाके मैं ब्राह्मण इस हालत में नही है कि वह माया के वोट बैंक से मिलकर उसे सत्ता तक पहुँचा सके । ऐसे में मध्यप्रदेश में माया अकेले ब्राह्मणों के बूते नहीं रह सकती हैं । सम्भव है की वह अपना प्रतिनिधि इलाके के बहुसंख्यक वर्ग से ही चुने । यह ब्राह्मण,ठाकुर,बनिया या फिर कोई भी हो सकता है । यूपी में उन्होने इस फार्मूले को अपनाने का मन तभी बना लिया था जब भाजपा ने दूसरी बार उनकी सरकार गिराई थी । माया और उनके साथियों ने तभी सीधे जनता के बीच जाकर गठबंधन करने की बात कही थी। इस अवसर को वहां ब्राह्मणों ने पहले पकड़ा । यूपी के ब्राह्मणों के मध्य प्रदेश में संबंध हैं । रोटी बेटी के सम्बन्ध। सत्ता के इस खेल में इन संबंधों के जरिये भी अवसर लपकने की कवायद चल रही है। इस मामले में मध्यप्रदेश के सामाजिक कार्यकर्त्ता और राजनीति में दखल रखने वाले मेरे एक मित्र की टिप्पणी मायने रखती है। जब इस से मायावती के इस जादू के बारे में पूछा तो उसका कहना था कि प्रदेश में इन दिनों सभी पंडितों में ख़ुद को सबसे बड़ा दलित साबित करने की होड़ लगी हुई है । जबकि मेरे मित्र का कहना था की मायाबती की पार्टी को मप मैं यूपी सी सफलता नही मिलने वाली है । वह इसके कारण भी गिनाता है। पहला तो यह की यूपी का ब्रह्मण ख़ुद को ठगा महसूस कर रहा था । उसे न तो बीजेपी में जमीन दिख रही थी और न ही यादवों के बीच सम्मान । उन्हें ये सम्मान दलितों में दिखाई दिया । मप के ब्राह्मणों के सामने इस तरह के हालत नहीं हैं । यहाँ जातीय उन्माद की हालत भी वैसी नहीं है। तीसरे प्रदेश का वोटर अभी दो पार्टियों से इतर विकल्प की तलाश मैं नहीं है । मायावती के सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला भले ही उन्हें मप की सत्ता न दिला पाए लेकिन इतना तय है की उसने इस प्रदेश की उच्च जाती के मूंछ और पूंछ के बल खोल दिए हैं । जातिवाद के उन्मादी अब बेशर्म तरीके से ही ख़ुद को बडा कह सकते हैं । माया के जातिवादी राजनेतिक घोल ने वो कर दिखाया है जो कभी अम्बेडकर और बुद्ध नहीं कर सके । सत्ता की सस्ती डगर पर चलने को आतुर सवर्ण जाति के दिग्गजों के बीच आज ख़ुद को सबसे बड़ा अम्बेडकरवादी साबित करने की होड़ लगी हुई है । यह सामाजिक बदलाव है । कल तक जिसे अछूत माना आज उसकी बराबरी करने की आतुरता। यह सत्ता का जादू हो सकता है लेकिन इस जादू ने जातीय दर्प की सच्चाई की पोल तो खोल ही दी है।

सिद्धनाथ के आगे हार गई विकलांगता

भोपाल। 'कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' लगता है दुष्यंत कुमार ने ये पंक्तियां अपंग सिद्धनाथ जैसे लोगों के लिए ही लिखी थी। तभी तो दोनों हाथ और एक पैर न होने के बावजूद सिद्धनाथ ने शिक्षक बनने में सफलता हासिल की।
मध्यप्रदेश के शाजापुर के कारजू गांव के खेतिहर मजदूर परिवार में पैदा हुआ सिद्धनाथ बचपन से ही अपंग था। उसके दोनों हाथ और एक पैर नहीं थे। कुदरत की इस नाइंसाफी को उसने अपनी कमजोरी नहीं माना। उसकी इच्छा पढ़ने की थी। इसके लिए उसने अपने पिता से जिद की और गांव के स्कूल में दाखिला ले लिया।
सिद्धनाथ ने अपने दोनों हाथों की कमी को पैर से पूरा करने की ठानी। स्कूल पहुंचे सिद्धनाथ के लिए सबसे बड़ी समस्या लिखने की आई। उसने पैर की उंगलियों में पेंसिल फंसाकर लिखना शुरू किया। समय गुजरने के साथ उसकी यह कोशिश रंग लाने लगी और उसने पैर से लिखने में महारत हासिल कर ली। सिद्धनाथ ने पांचवीं तक गांव में पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई के लिए उसने दूसरे गांव मंडोदा के स्कूल में दाखिला लिया। वह रोज तीन किलोमीटर दूर मंडोदा जाता और इस तरह आठवीं तक की पढ़ाई पूरी की। सिद्धनाथ ने आगे की पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया। इसके लिए उसे अपने गांव से 15 किलोमीटर अभयपुरा जाना पड़ा। सिद्धनाथ ने स्कूल के एक कमरे को ही अपना आशियाना बना लिया। वह दिन में पढ़ाई करता और रात में पैर से ही स्टोव जलाकर खाना भी बनाता। 11 वीं की परीक्षा पास करने के बाद सिद्धनाथ ने शिक्षक बनने का मन बनाया। हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद सिद्धनाथ ने घड़ियां बेचकर बी काम, एम काम और एलएलबी की डिग्री ली। नौकरी नहीं मिली तो उसने टेलीफोन बूथ खोल ली। सिद्धनाथ का शिक्षक बनने का प्रयास फिर भी जारी रहा। अंतत: वह शिक्षक बन ही गया। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सिद्धनाथ को राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने का गौरव भी हासिल हो चुका है।

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