सिद्धनाथ के आगे हार गई विकलांगता
भोपाल। 'कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' लगता है दुष्यंत कुमार ने ये पंक्तियां अपंग सिद्धनाथ जैसे लोगों के लिए ही लिखी थी। तभी तो दोनों हाथ और एक पैर न होने के बावजूद सिद्धनाथ ने शिक्षक बनने में सफलता हासिल की।
मध्यप्रदेश के शाजापुर के कारजू गांव के खेतिहर मजदूर परिवार में पैदा हुआ सिद्धनाथ बचपन से ही अपंग था। उसके दोनों हाथ और एक पैर नहीं थे। कुदरत की इस नाइंसाफी को उसने अपनी कमजोरी नहीं माना। उसकी इच्छा पढ़ने की थी। इसके लिए उसने अपने पिता से जिद की और गांव के स्कूल में दाखिला ले लिया।
सिद्धनाथ ने अपने दोनों हाथों की कमी को पैर से पूरा करने की ठानी। स्कूल पहुंचे सिद्धनाथ के लिए सबसे बड़ी समस्या लिखने की आई। उसने पैर की उंगलियों में पेंसिल फंसाकर लिखना शुरू किया। समय गुजरने के साथ उसकी यह कोशिश रंग लाने लगी और उसने पैर से लिखने में महारत हासिल कर ली। सिद्धनाथ ने पांचवीं तक गांव में पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई के लिए उसने दूसरे गांव मंडोदा के स्कूल में दाखिला लिया। वह रोज तीन किलोमीटर दूर मंडोदा जाता और इस तरह आठवीं तक की पढ़ाई पूरी की। सिद्धनाथ ने आगे की पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया। इसके लिए उसे अपने गांव से 15 किलोमीटर अभयपुरा जाना पड़ा। सिद्धनाथ ने स्कूल के एक कमरे को ही अपना आशियाना बना लिया। वह दिन में पढ़ाई करता और रात में पैर से ही स्टोव जलाकर खाना भी बनाता। 11 वीं की परीक्षा पास करने के बाद सिद्धनाथ ने शिक्षक बनने का मन बनाया। हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद सिद्धनाथ ने घड़ियां बेचकर बी काम, एम काम और एलएलबी की डिग्री ली। नौकरी नहीं मिली तो उसने टेलीफोन बूथ खोल ली। सिद्धनाथ का शिक्षक बनने का प्रयास फिर भी जारी रहा। अंतत: वह शिक्षक बन ही गया। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सिद्धनाथ को राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने का गौरव भी हासिल हो चुका है।
मध्यप्रदेश के शाजापुर के कारजू गांव के खेतिहर मजदूर परिवार में पैदा हुआ सिद्धनाथ बचपन से ही अपंग था। उसके दोनों हाथ और एक पैर नहीं थे। कुदरत की इस नाइंसाफी को उसने अपनी कमजोरी नहीं माना। उसकी इच्छा पढ़ने की थी। इसके लिए उसने अपने पिता से जिद की और गांव के स्कूल में दाखिला ले लिया।
सिद्धनाथ ने अपने दोनों हाथों की कमी को पैर से पूरा करने की ठानी। स्कूल पहुंचे सिद्धनाथ के लिए सबसे बड़ी समस्या लिखने की आई। उसने पैर की उंगलियों में पेंसिल फंसाकर लिखना शुरू किया। समय गुजरने के साथ उसकी यह कोशिश रंग लाने लगी और उसने पैर से लिखने में महारत हासिल कर ली। सिद्धनाथ ने पांचवीं तक गांव में पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई के लिए उसने दूसरे गांव मंडोदा के स्कूल में दाखिला लिया। वह रोज तीन किलोमीटर दूर मंडोदा जाता और इस तरह आठवीं तक की पढ़ाई पूरी की। सिद्धनाथ ने आगे की पढ़ाई जारी रखने का फैसला किया। इसके लिए उसे अपने गांव से 15 किलोमीटर अभयपुरा जाना पड़ा। सिद्धनाथ ने स्कूल के एक कमरे को ही अपना आशियाना बना लिया। वह दिन में पढ़ाई करता और रात में पैर से ही स्टोव जलाकर खाना भी बनाता। 11 वीं की परीक्षा पास करने के बाद सिद्धनाथ ने शिक्षक बनने का मन बनाया। हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद सिद्धनाथ ने घड़ियां बेचकर बी काम, एम काम और एलएलबी की डिग्री ली। नौकरी नहीं मिली तो उसने टेलीफोन बूथ खोल ली। सिद्धनाथ का शिक्षक बनने का प्रयास फिर भी जारी रहा। अंतत: वह शिक्षक बन ही गया। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सिद्धनाथ को राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने का गौरव भी हासिल हो चुका है।
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